Sunday, March 1, 2026

अंतरिक्ष में आवाज क्यों नहीं सुनी जा सकती?

यह एक मजेदार सवाल है जो अक्सर मानव की अंतरिक्ष यात्रा से जोड़ा जाता है। मैंने इसे मानव के चंद्रमा की यात्रा की कहानी में पहली बार सुना था। जब नील आर्मस्ट्रांग और बज़ अल्डरिन चंद्रमा की सतह पर उतरे तो उन्हें वो दुनिया एकदम बेआवाज लगी। एक दूसरे से पास में होने के बावजूद, दोनों ने एक दूसरे से रेडियो सेट की मदद से बात की। अंतरिक्ष में भी इसी तरह की नीरव शांति का अहसास अंतरिक्ष यात्रियों को होता है। अब सवाल उठता है कि आखिर में ऐसा क्यों है?

अंतरिक्ष यात्री 

मीडिल स्कूल की विज्ञान की किताब में हम पढ़ते हैं कि आवाज को चलने के लिए माध्यम की जरूरत होती है। हमारे दैनिक जीवन में यह माध्यम है हवा में मौजूद कण। वैसे आवाज किसी भी भौतिक और घने माध्यम से चल सकती है, जैसे ठोस, तरल या गैस पदार्थों से यह चल सकती है। क्योंकि, ये पदार्थों में मौजूद कणों के कंपन से आगे बढ़ती है।  माध्यम जितना घना यानि मौजूद कणों की संख्या जितनी ज्यादा उतनी आवाज की गति और स्पष्टता ज्यादा होती है। यह गति और स्पष्टता ठोस में ज्यादा, तरल पदार्थों में कम और गैसीय पदार्थों में और कम होती है। 

ध्वनि तरंगे

पृथ्वी पर साधारण परिस्थितियों में आवाज करना और सुनना आसान होता है। आवाज या ध्वनि, अनुदैर्ध्य तरंगों (Longitudinal waves) के रूप में चलती हैं, जिसमें हवा के कणों में लगातार संपीडन (compression) और विरलन (rarefaction) बनता है और उसके माध्यम से आवाज आगे बढ़ती है।  पृथ्वी पर रहते हुए हमें हवा की मौजूदगी में ध्वनि उत्पन्न करना आसान होता है। हम ध्वनि बनाने में हमारे गले मे मौजूद स्वर यंत्र (Larynx) का उपयोग करते हैं। जब हम बोलते हैं तो फेफड़े हवा को ऊपर की ओर धकेलते हैं। स्वरयंत्र के भीतर दो स्वर रज्जु (vocal cords) होते हैं। फेफड़ों से आने वाली हवा जब इनके बीच के संकीर्ण मार्ग (Slit) से गुजरती है, तो ये तेजी से कंपन करने लगते हैं। इससे ध्वनि उत्पन्न होती है। लेकिन इस ध्वनि को शब्दों और वाक्यों का आकार हमारे होंठ, जीभ, दांत और तालू देते हैं। आवाज में भारीपन और तीखापन स्वर रज्जुओं की लंबाई और तनाव पर निर्भर करता है। इसे मांसपेशियों के तनाव से नियंत्रित किया जाता है। जब स्वर रज्जु तने हुए और पतले होते हैं तब आवाज की पिच तीखी (उच्च) होती है, जब ये ढीले होते हैं, तो आवाज भारी होती है। 

स्वर यंत्र की रचना 

अंतरिक्ष एक खाली जगह है। इस तरह की खाली जगह में अनुदैर्ध्य तरंगों को चलने के लिए हवा या कणों का माध्यम उपलब्ध नहीं होता। इसलिए अंतरिक्ष में आवाज बनना और चलना संभव नहीं होता। यह वास्तव में डरावना लग सकता है कि आप अंतरिक्ष में हो और आपको कोई सुन ना सके। कुछ यही हाल चंद्रमा का भी है, जहां हवा की अनुपस्थिति की बात हमें पता है।  

अब यह देखते हैं कि अंतरिक्ष कितना खाली होता है। अगर हम एक क्यूबिक सेंटीमीटर आयतन की बात करें जो कि एक शुगर क्यूब के बराबर होता है। इतनी जगह में पृथ्वी पर वायुमंडल में समुद्र सतह पर 25 लाख करोड़ करोड़ (2.5 x 10 ^19 )कण हो सकते हैं। पृथ्वी के बाहरी वायुमंडल के छोर पर कणों की ये सघनता एक क्यूबिक सेंटीमीटर में 10 लाख से 1 अरब तक होती है। हमारे सौरमंडल परिसर में एक क्यूबिक सेंटीमीटर में 5 से 10 कण हो सकते हैं। अन्तरतारकीय (Interstellar) अंतरिक्ष में एक क्यूबिक सेंटीमीटर में आपको 10^-6 या 0.00000 1 कण हो सकता है। मतलब आप अगर 10 लाख क्यूबिक सेंटीमीटर (जो 100 लीटर पानी के कंटेनर जितना बड़ा होगा) की जगह में किसी कण को खोजेंगे तब जाकर किसी एक क्यूबिक सेंटीमीटर की  जगह में आपको एक कण मिलने की संभावना है। अन्तरतारकीय अंतरिक्ष एक तरह से काफी खाली जगह है। 

एक क्यूबिक सेन्टमीटर की जगह मे कणों की संख्या। यह एक एआइ से बनाई गई तस्वीर है जो पैमाने पर नहीं है। 

जैसे पृथ्वी को छोड़कर बाहरी अंतरिक्ष में जाते हैं, हमने देखा कि कणों की संख्या बहुत तेजी से कम जाती है। वैसे देखा जाए तो अंतरिक्ष बिल्कुल भी खाली जगह नहीं है। यहाँ कई तरह की विद्युत चुंबकीय तरंगे (Electro Magnetic waves) मौजूद रहती है। हाँ, अगर हमारे कान इन विद्युत चुंबकीय तरंगों के लिए ट्यून हो जाए तो हमें एक अलग तरह का शोर सुनने को मिलेगा। 

कई सालों तक खगोलविज्ञानी अंतरिक्ष के अध्ययन करते वक्त तस्वीरें या अलग-अलग पैमाने के डेटा चार्ट्स ही उपयोग करते थे। तब ऐसे ही लगता था कि अंतरिक्ष एक तरह से बेआवाज है, जो सिर्फ तस्वीरें और चार्ट्स के जरिए ही देखा और समझ जा सकता है। बीती सदी के चौथे दशक में पहली बार खगोल विज्ञानियों ने अंतरिक्ष से आनेवाली आवाज एक रेडियो एन्टेना की मदद से सुनी। तब से हम अंतरिक्ष के अलग-अलग पिंडों को सुनकर उन्हें समझने की कोशिश भी कर रहे हैं। 

कई खगोलीय पिंडों को रेडियो फ्रीक्वन्सी पर सुना जा सकता है। रेडियो तरंगें आवेशित (Charged) इलेक्ट्रॉनों के टकराने या उनके चुंबकीय क्षेत्रों से होनेवाले संपर्कों से बनती है। ये तरंगें अलग-अलग खगोलीय घटनाओं में अलग-अलग तरह की फ्रीक्वन्सी में बनती है। इन्हें सुनकर यह पता लगाया जा सकता है कि वहाँ क्या चल रहा है। सूर्य से हमेशा इस तरह की रेडियो तरंगे आती है, क्योंकि वहाँ पर हमेशा असंख्य आवेशित कणों की उथल-पुथल मची रहती है। सूर्य अपने 11 वर्ष में आनेवाले कलंकचक्रों में ज्यादा ऐक्टिव रहता है, तब कई बार वह सोलर फ्लेयर (Solar Flares) अंतरिक्ष में उत्सर्जित करता है। इस घटना से निकली रेडियो तरंगों को जब कैप्चर कर सुना जाता है, तब वह आवाज तूफानों के गड़गड़ाहट जैसी होती है। सोलर फ्लेयर से निकले असंख्य चार्ज्ड कण जब पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं तब वे भी रेडियो तरंगें बनाते हैं। यह आवाज सुबह चहचहाने वाले बहुत सारे पक्षियों जैसी होती है। अगर हम सूर्य पर होने वाले घटनाओं से उत्पन्न रेडियो तरंगों की ध्वनि सुन पाते तो यह बड़े शोर शराबे वाला माहौल होता। ठीक ही है हम इस आवाज को सुन नहीं पाते। 

सूर्य और पृथ्वी के बाद बृहस्पति, शनि जैसे ग्रहों की रेडियो तरंगें सुनी जा सकती है। गहरे अंतरिक्ष में पल्सर, ब्लैक होल और क्वेसार जो दूसरी आकाशगंगा में होते हैं उनकी भी रेडियो तरंगे सुनी जाती है। वैसे पूरे ब्रह्मांड में भी एक तरह का शोर है जिसे कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन (Cosmic Microwave Background Radiation) कहते हैं। ऐसे में हम कह सकते हैं कि हमारा अंतरिक्ष बेआवाज तो है नहीं, बस हमारे कान इसे सुन नहीं पाते।     

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