7 सितंबर 2025 को हमने एक बड़ा मजेदार चंद्रग्रहण देखा| यह ग्रहण भारत से पूरा दिखाई दिया था| मतलब इसके शुरुआत से लेकर इसके अंत तक का ग्रहण| चंद्रग्रहण,सूर्यग्रहण की तुलना में ज्यादा समय दिखते हैं | इनकी अवधि सूर्यग्रहण की तुलना में ज्यादा होता है| अमूमन पूर्ण-सूर्यग्रहण 2 से 5 मिनट की अवधि के होते है| जब की चंद्रग्रहण एक से डेढ़ घंटे तक के हो सकते हैं, कुछ तो और भी ज्यादा समयावधि के हो सकते हैं| ग्रहण की समयावधि कई कारकों पर भी निर्भर करती है|
कक्षा 7 के विज्ञान की किताब
में पाठ 12 पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य में ग्रहण जुड़ी हुई बातें है| यहाँ पर हम यह बात
करेंगे की कैसे ग्रहण और विज्ञान की अन्य अवधारणाओं के जोड़ कर रोचक तरीके से काम किया
जा सकता है| इसके लिए चाल, समय, और दूरी के सूत्र से ग्रहण की समयावधि को कैसे निकाले
इसे समझेंगे| इस सूत्र पर इसी कक्षा में पाठ 8 समय एवं गति का मापन में चर्चा की गई
है| इसे हम चंद्रमा की उसकी कक्षा मे गति और पृथ्वी की छाया के आकार से समझने और मापने
की कोशिश करेंगे|
चंद्रमा की गति
चंद्रमा को पृथ्वी की एक परिक्रमा
पूर्ण करने के लिए अपनी कक्षा में लगभग 24
लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है और
इसे करने के लिए उसे 29.5 दिन का अवधि लगता है। इसलिए चंद्रमा को अपनी कक्षा मे खूब
तेजी से चलना पड़ता है और यह गति है 1.02 किलोमीटर प्रति सेकंड या 3,683 किलोमीटर प्रति
घंटा| लेकिन यह गति उसकी कक्षा मे एक समान नहीं रहती जब वह पृथ्वी के नजदीक होता है
तब बढ़ जाती है और जब वह पृथ्वी के दूर जाता है तब यह गति घट जाती है|
ग्रहण और पृथ्वी की छाया
हम सभी जानते हैं की ग्रहण महज परछाई वाला खेल है जो अंतरिक्ष में चलता है| सूर्यग्रहण पृथ्वी और सूर्य के बीच जब चंद्रमा आता है तो चंद्रमा की छोटी सी परछाई पृथ्वी पर जिस इलाके पर पड़ती है वहाँ से सूर्य कुछ देर के लिए चंद्रमा के पीछे छुप जाता है और सूर्यग्रहण दिखता है| वैसे ही जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी से विरुद्ध दिशा में पृथ्वी के परछाई से गुजरता है तब चंद्रग्रहण होते हैं|
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| आकृति 1 -चंद्रग्रहण की स्तिथि |
पृथ्वी की परछाई चंद्रमा से बड़ी होती है और अगर इसकी कल्पना की जाए तो यह अंतरिक्ष में एक शंकु के आकार की बनती है| मतलब पृथ्वी के पास यह पृथ्वी के आकार की होती है और जैसे जैसे पृथ्वी से दूरी बढ़ती है यह छोटी होती जाती है| लगभग 14 लाख किलोमीटर की दूरी पर यह समाप्त हो जाती है| यहाँ हम पृथ्वी की मुख्य छाया यानि Umbra की बात कर रहे हैं| इसे अगर त्रिआयामी में कल्पना करें तो यह शंकु आकार की दिखेगी और इसका कोई एक सेक्शन या काट ली जाए तो द्विआयामी में यह एक वृत्त जैसी होगी| चंद्रमा की कक्षा की दूरी पर इस वृत्ताकार छाया का व्यास लगभग 9,000 किलोमीटर होता है|
चंद्रमा की नजदीक और दूर की स्तिथि
जब चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के
सबसे नजदीक के बिन्दु पर जिसे उपभू (Perigee) कहते हैं, यह दूरी 3,63,300 किलोमीटर होती है| तब धरती की छाया का व्यास लगभग 9,600 किलोमीटर होता है| चंद्रमा
का व्यास 3,476 किलोमीटर है| अगर चंद्रमा से इसकी तुलना करें तो इस दूरी पर पृथ्वी की छाया का आकार
चंद्रमा से 2.6 गुना बड़ा होता है| इस बिन्दु के पास चंद्रमा की गति अपनी कक्षा में ज्यादा
होती है| क्योंकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण इतने
नजदीक चंद्रमा पर ज्यादा बल लगाता है और उसकी गति बढ़ जाती है और पृथ्वी की छाया को
वह जल्द पार कर लेता है|
| आकृति 2- चंद्रमा की कक्षा मे नजदीक और दूर की स्तिथि |
जब चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के
सबसे दूर के बिन्दु पर होता है,जिसे अपभू (Apogee) कहते हैं, यह दूरी 4,05,000 किलोमीटर होती है| तब धरती की छाया का व्यास लगभग 9,200 किलोमीटर होता है| यह आकार
इस दूरी पर चंद्रमा से 2.2 गुना हो
जाता है| जब चंद्रमा पृथ्वी से दूर होता है तब पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उस पर कम लगता है,इस वजह से उसकी गति
जरा सी धीमी पड जाती है|| धीमी गति
की वजह से पृथ्वी की छाया को पार करने मे थोड़ी ज्यादा देर लगती है| इस वजह से छाया का आकार कम होने पर भी इसे पार करने मे
थोड़ा ज्यादा समय लगता है|
जब चंद्रमा पृथ्वी के नजदीक होता है
तब उसकी गति लगभग 3,900 किलोमीटर प्रति घंटा होती है|
और जब वह कक्षा मे पृथ्वी से दूर होता है तब उसकी
गति लगभग 3,470 किलोमीटर प्रति घंटा होती है|
पूर्ण चंद्रग्रहण का समय इससे भी निर्धारित होता है की चंद्रमा की
कक्षा पृथ्वी के छाया से कौनसे हिस्से से गुजरेगा| अगर वह पृथ्वी के छाया के बीचों-बीच
से गुजरेगा तो उसे ज्यादा समय लगेगा
और वह छाया के छोटे हिस्से से गुजरेगा तो वह कम समय मे ही इसे तय कर लेगा|
पर जब वह नजदीक होगा तो इसे करने में उसे कम समय
लगेगा और दूर होने पर ज्यादा समय|
अब हम ऐसे दो ग्रहण का उदाहरण लेते हैं
जिनमे से एक उपभू (Perigee) और एक अपभू
(Apogee) बिन्दु के पास हुआ था| यह दोनों ग्रहण
ऐसे हैं जिनमे चंद्रमा ने मुख्य छाया
के केंद्र रेखा के पास से गुजरा था| एक 7 सितंबर 2025 जो की उपभू बिन्दु के पास हुआ
था और 27 जुलाई 2018 जो अपभू बिन्दु के पास हुआ था|
7 सितंबर 2025 की चंद्रग्रहण में चंद्रमा ने पृथ्वी की मुख्य छाया में 5116 किलोमीटर की दूरी तय की थी, जो मुख्य छाया के केंद्र रेखा के पास से थी और इसिलए यह
एक लंबे समय का ग्रहण था। लेकिन उपभू बिन्दु के पास होने से समय तुलना में कम था| चंद्रमा
जब मुख्य छाया को स्पर्श करता है तब ग्रहण शुरू होता है और जब उसमे से पूरी तरह निकाल
जाता है तब खत्म होता है| इसिलए इस मुख्य छाया की दूरी में हमें चंद्रमा के व्यास की
दूरी जो 3476 km है, दो बार जोड़नी होगी| तो अब यह कुल दूरी 12064 km हो जाती है|
स्तिथि 1- जब
चंद्रमा पृथ्वी के पास है ।
चंद्रमा को पृथ्वी के मुख्य छाया को
पार करने के
लिए लगने वाली दूरी = d = 12,064 km
चन्द्रमा की गति 7 सितंबर को = s1 = 3,708 km /h
इसे तय करने मे लगने वाला समय- t1
चाल= समय x दूरी
समय = दूरी / चाल
t1 = 12,064 km / 3,708 km/hr
t1 = 3.2535 hr
t1 = 3 hr 15 min 13 sec.
वास्तविकता में यह कालावधी 3 घंटे 27 मिनट का
था|
अब 27 जुलाई 2018 के ग्रहण की स्तिथि को लेते है जहाँ चंद्रमा
कक्षा में पृथ्वी से दूर था और पृथ्वी की छाया के केंद्र रेखा से गुजरा था,
तब कितना समय लगा? पृथ्वी के मुख्य छाया से चंद्रमा का मार्ग 5,900
km था| मुख्य
छाया को स्पर्श करने से उससे निकलने में तय की गई दूरी 12,750
km
चंद्रमा को पृथ्वी के मुख्य छाया को
पार करने के लिए लगने वाली दूरी = d = 12,750 km
चंद्रमा की गति 27 जुलाई = s2 = 3,456 km/hr
समय = दूरी / चाल
t1 = 12,750 km / 3,456 km/hr
t1= 3. 68 hr
t1 = 3 hr 41 min 21 sec
वास्तविकता मे यह कालावधी 3 घंटे 55 मिनट की
थी|
अगर चंद्रमा की गति 7 सितंबर वाली होती तो यह ग्रहण 3 घंटे 26 मिनट में पूरा हो जाता|
चाल समय दूरी के सूत्र से एक अंदाजा
मिल जाता है की यह समय कितना कम ज्यादा होता है| वैसे ही यह समय मुख्य छाया के अंदर कितना होगा यह भी पता लगा कर पूर्ण
चंद्रग्रहण का समय भी निकाला जा सकता है|
7 सितंबर के पूर्ण चंद्रग्रहण की स्तिथि
की समयावधि का पता कर सकते है| जैसे चंद्रमा ने
पृथ्वी की मुख्य छाया की 5116 km दूरी तय की थी| इसी सूत्र का उपयोग करते हुए यह समय 1 घंटा 18
मिनट 42 सेकंड
आता है| जो उस दिन के वास्तविक कुल समय 1
घंटा 22 मिनट के
नजदीक है|
हम इस पर क्यों बात करें?
जब बच्चों के साथ विज्ञान को दैनिक
अनुभवों के साथ जोड़ने की बात आती है,तब शिक्षक काफी बेबस लगते हैं। क्योंकि
विज्ञान की बातों को बहुत सटीकता के साथ बिठाने के चक्कर मे शिक्षकों को लगता है
की विज्ञान सिर्फ प्रयोगशालाओं मे ही समझा और लागू किया जा सकता है| इससे बच्चे विज्ञान के सूत्र और सिद्धांत को
दैनिक घटनाओं से जोड़कर देखने की क्षमता को विकसित नहीं कर पाते और विज्ञान बोझिल
लगने लगता है|
शिक्षक या अभिभावक क्या कर सकते हैं-
शिक्षक आगे आने वाले चंद्रग्रहण का
डेटा इंटरनेट से निकाल सकते हैं जैसे चंद्रमा पृथ्वी के कितने नजदीक है। उसकी गति
क्या है,और उसकी कक्षा का कितना मार्ग पृथ्वी की छाया से गुजर रहा है?
इन जानकारी से संबंधित वह बच्चों को प्रोजेक्ट दे
सकते हैं कि वह इस सूत्र का उपयोग कर ग्रहण का समय निकाले और वास्तविक अवलोकन से इसे जोड़े|
यह एक मजेदार प्रोजेक्ट हो सकता है जो बच्चों को
ग्रहण जैसे घटनाओं के अवलोकन, अनुभव और
तुलना करने मे मदद कर सकता है|











