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Thursday, October 3, 2019

कैसे नापी गयी धरती की परिधि?

हमारी धरती का आकार कितना बड़ा है यह हमने कब जाना होगा? काफी लोगो का मानना है कि कोलंबस जब हिंदुस्तान की खोज में समुद्री यात्रा पर निकले थे तब उन्होंने धरती का आकार नापा था| लेकिन कोलंबस को जो आंकड़ा मिला वो आज की तुलना में काफी छोटा था| कुछ लोग मानते है कि जब कोलंबस के बाद लोगो ने दूर की समुद्री यात्रायें शुरू करी तब उन्होंने धरती का आकार नापा होगा| लेकिन धरती के आकार को उससे भी कई सदियों पहले नापा गया था|  यह कारनामा किया था एराटोस्ठेनिस ने वह भी दो हज़ार साल पहले,तब तक इंसानों को ना अमेरिकी महाद्वीप के बारे न पता था और ना ही ऑस्ट्रेलिया या अन्टार्क्टिक महाद्वीप के बारे में| तब तक प्रशांत, अटलांटिक और हिन्द महासागर भी पूरी तरीके से इंसानों को पता नहीं थे| (यहाँ हम उन इंसानों की बात कर रहे है, जिन्होंने इतिहास लिखा है| वैसे अन्टार्क्टिक को छोड़ कर सभी महाद्वीपों पर इन्सान बसते थे| लेकिन उस दौर में बहुत कम सभ्यतायें एक दूसरे के बारे में जानती थी|) आज की दुनिया के मुकाबले मान लीजिये हमे सिर्फ एक चौथाई धरती की ही जानकारी थी| फिर भी एराटोस्ठेनिस ने पृथ्वी को लगभग सही ही नाप लिया था|

एराटोस्ठेनिस के समय की दुनिया का मानचित्र
एराटोस्ठेनिस का जन्म कायरिन (Cyrene) नाम के शहर में 276 इसा पूर्व में हुआ था| यह शहर उस समय ग्रीक साम्राज्य का हिस्सा था| आज यह जगह शहात नाम से जानी जाती है और यह लीबिया देश का हिस्सा है| एराटोस्ठेनिस ने अपनी शिक्षा अथेंस शहर से पूरी की और शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने मूल शहर कायरिन में वापस आ गए| तीस उम्र की आयु में उन्हें अलेक्झांड्रिया (Alexandria) शहर के शासक टोलेमी III ने अपने बेटे की पढाई के लिए शिक्षक के रूप में नियुक्त किया| उस दौरान अलेक्झांड्रिया लाइब्रेरी के मुख्य लाइब्रेरियन का देहांत हुआ तब अलेक्झांड्रिया के शासक ने एराटोस्ठेनिस को मुख्य लाइब्रेरियन नियुक्त किया|

एराटोस्ठेनिस में कई हुनर थे| उन्हें कई विषयों में महारथ हासिल थी जैसे भूगोल, खगोल-विज्ञान, गणित, साहित्य, काव्य और इतिहास| उनके द्वारा कहा गया सारा काम अतीत में कही गुम हो गया|  एराटोस्ठेनिस के काम की जानकारी हमे दुसरे दार्शनिकों से मिलती है, जैसे क्लेओमेडस, प्लीनी, स्ट्राबो और टोलेमी|

धरती का आकार
उस जमाने में लोग जानते थे कि  हमारी धरती का आकार एक गोले जैसा है| इस निष्कर्ष पर लोग कई अवलोकनों के आधार से पहुंचे थे| जैसे उस वक़्त समुद्री यात्राओं पर जानेवाले जहाज दूर समुद्र में जाते तो किनारे पर से दिखता था कि धीरे धीरे जहाज का निचला हिस्सा डूब रहा है| फिर ध्वजस्तम्भ डूबता दिखता और फिर बाद में उस पर लगी ध्वजा भी डूबती दिखती| लोगो को लगता की जहाज डूब गया है| लेकिन कुछ दिनों बाद वही जहाज किनारे लौट आता| यह इसीलिए संभव है जब धरती गोल है और इसी वजह से जहाज धीरे धीरे दृष्टिक्षेप से ओझल हो जाता| दुसरे अवलोकन मे चन्द्रग्रहण के वक़्त जब धरती सूरज और चन्द्रमा के बीच आ जाती तब चन्द्रमा पर धरती की गोल परछाई दिखाई देती थी| लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था की धरती का गोला कितना बड़ा होगा| इसे नापने की कोशिशे तो बहुत लोगो ने की पर किसी को सफलता नहीं मिली| उस वक़्त तक ज्यमिती विषय पर लोगो की समझ बन गयी थी| इसी ज्यामिति का उपयोग कर एराटोस्ठेनिस ने धरती का आकार नाप लिया|

एराटोस्ठेनिस काम के सिलसिले में अलग अलग शहर यात्रायें करते थे| ऐसे ही एक दिन वह अलेक्झांड्रिया के दक्षिण स्थित सायन (Syene) शहर में थे| दोपहर के वक़्त उन्होंने देखा की एक कुँए में सूरज की रोशनी सीधे कुँए के तल तक पहुंची हुई थी| सायन में उस दिन सूरज सीधा माथे पर था और आसपास के चीजों कि छाया भी सीधे निचे बन रही थी| (सायन शहर जो आज आस्वान नाम से जाना जाता है, उसकी स्थिति कर्क रेखा पर है| हम जानते है कि 22 जून को सूर्य इस रेखा पर होता है|) फिर अगली बार उसी दिन जब अलेक्झांड्रिया में थे, उन्होंने देखा की सूरज माथे पर होने के बावजूद चीजों की छाया पड रही थी| उन्होंने सोचा कि सायन में इसी दिन चीजों की छाया सीधे निचे बनती है, लेकिन यहाँ पर तो ऐसा नहीं हो रहा है| मतलब सूरज से आने वाली किरणों का कुछ कोण बन रहा है| यह तभी मुमकिन होगा जब धरती गोल होगी| अगर सूरज की किरणों का कोण मापा जाये तो पृथ्वी का आकार भी पता किया जा सकता है|

एक ही दिन सायन और अलेक्झांड्रिया में पड़नेवाली किरणों का कोण अलग बनता है|
अगर हमे वृत्त पर बननेवाला कोण पता है और और चाप का मान पता है तो हम वृत्त की परिधि निकाल सकते है| एराटोस्ठेनिस ने उस दिन सूरज की रोशनी का कोण एक छड़ी की सहायता से नाप लिया जो 7.2 डिग्री था| सूरज की किरणे धरती पर सामानांतर रूप में गिरती है, तो छड़ी से बनने वाला कोण वृत्त के केंद्र से बननेवाले कोण का एकांतर (alternate angle) कोण भी होगा| एकांतर कोण एक दुसरे के समान होते है| एराटोस्ठेनिस को अलेक्झांड्रिया और सायन के बिच दुरी पता थी, यह था हमारे धरती के वृत्त का चाप| यह मान 5000 स्टेडिया था| स्टेडिया, दुरी नापने की ग्रीक इकाई थी| यह इकाई ग्रीक स्टेडियम याने उनके मैदानों के बराबर थी| एक स्टेडिया का मान उस समय ग्रीक में अलग था और मिस्र में अलग था| ग्रीक में एक स्टेडिया आज के 185 मीटर और मिस्र में 157 मीटर बराबर है|

आकृति 1
अलेक्झांड्रिया और सायन की दुरी के साथ वृत्त के एक कोण और पुरे वृत्त के कोण की तुलना कर पुरे वृत्त का मान निकाला जा सकता है|

360 डिग्री / 7.2 डिग्री = धरती की परिधि / अलेक्झांड्रिया और सायन की दुरी

360 डिग्री / 7.2 डिग्री = धरती की परिधि / 5000 स्टेडिया

धरती की परिधि = 50 X 5000

धरती की परिधि =  2,50,000 स्टेडिया

एराटोस्ठेनिस ने धरती के आकार का मान 2,50,000 स्टेडिया निकाला| अगर आज के हिसाब से इसे देखा जाये तो,
2,50,000 X 157 मीटर = 3925०००० मीटर यानि 39,250 किलोमीटर
यह मान आज के आधुनिक तकनीक से नापे गए मान के लगभग बराबर था|

सिर्फ एक छड़ी की सहायता से सूरज की किरणों का कोण नापकर एराटोस्ठेनिस ने पूरी धरती का आकार नाप लिया था| जो उस समय पृथ्वी को मुठ्ठी में कर लेने के बराबर ही था| आज भी ज्यामिति और एक छड़ी की मदद से हम पृथ्वी के आकार को नाप सकते है|

एराटोस्ठेनिस (276 ईसा पूर्व- 194 ईसा पूर्व)


Sunday, August 5, 2018

Lunar eclispe from Mercury

We all have recently seen the century's longest Total Lunar Eclipse on 27 July this year. In total lunar eclipse moon turns red. Because, very small amount of light bend through earth's atmosphere and fall on moon. It's very beautiful and amazing phenomenon. What if we see Lunar Eclipse from a place other than earth! 
Yes, scientist has done that. In 2014 a lunar eclipse happened in October was seen by MESSENGER probe. This probe was orbiting around mercury planet. Here it's a GIF image. Here, Earth is bright star and moon a small star is disappearing into its shadow. It's really wonderful to see eclipse from such a distance. From earth we see hide and seek of Galilean satellites  (Jupiter's moons) but we can not see it's moon disappearing into Jupiter's shadow. With advance technology now we can see many things which we could not see from earth. 
MESSENGER mission was ended in April 2015 when NASA deliberately crashes probe on Mercury.
 
Earth at left bright star and Moon is disappearing into shadow, MESSENGER probe was at 107 million kilometers from the Earth at the time of eclipse. Source: NASA/Planetary society

Friday, August 3, 2018

कैसे समझे चन्द्रमा की कलाओं को?


स्कूली विज्ञान में केमिस्ट्री, फिजिक्स और बायोलॉजी विषयों को शिक्षक काफी आसानी से पढ़ा सकते है| लेकिन स्कूली विज्ञान में अगर कोई विषय अक्सर छुट जाता है तो वह है एस्ट्रोनॉमी या खगोल विज्ञान| खगोल विज्ञान की कई अवधारणायें (concepts)सामान्यता उतनी गंभीरता से नहीं पढ़ी जाती| कई तरह की खगोलीय अवधारणाओं को लेकर शिक्षकों के मन में भी सवाल होते है| उसमे से एक है चन्द्रमा की कलाएं| शिक्षक मुझे अक्सर सवाल पूछते है की चन्द्रमा के घटते बढ़ते आकार को कैसे समझाया जाये| चन्द्रमा की कलाओं समझ पाना उतना आसान नहीं होता| अगर किसी से यह सवाल भी पूछा जाये तो उसका जवाब ज्यादातर बार होता है की धरती की छाया चन्द्रमा पर गिरती है और वह हिस्सा ढक जाता है और हम कलाएं देख पाते है| यह कंफ्यूजन इसलिए भी होता है क्यूंकि ज्यादा तर बार ग्रहण के वक़्त यह कहा जाता है की हम शुरुवात से अंत तक चन्द्रमा की कलाएं ग्रहण में देख सकते है| लेकिन ग्रहण में चन्द्रमा की दशाएं और चन्द्र कलाएं इनमें काफी अंतर होता है| स्कूल में भी इनको समझ पाना उतना आसान नहीं होता| स्कूल की किताबों में चन्द्रमा की कलाओं को समझाने के लिए एक डायग्राम होती है जो समझ बढ़ने में शायद ही काम आती है| यह डायग्राम यह कहती है की धरती चन्द्रमा और सूरज के बिच के कोण बदलने की वजह से चंद्रमा की कलाएं दिखती है|

स्कूली किताबों में छपी जानेवाली डायग्राम, सोर्स internet


इसी डायग्राम को दूसरी तरह से समझने के लिए मॉडल बनाया जाता है| जिस में एक बल्ब और दो गेंदों की मदद से सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के बिच में बदलने वाले कोण को समझा जाता है| पर जब तक चन्द्रमा धरती के इर्दगिर्द घूमता कैसे है और अंतरिक्ष में उसकी जगह कैसे बदलती है, इसे समझा नहीं जाता तब तक कोई भी मॉडल या आकृति, चन्द्र कलाएं समझा पाने में शायद ही सफल हो|  अगर चन्द्र कलाओं को समझना है तो सबसे आसान तरीका है की हर रोज का चन्द्रमा देखना| और सूर्य के साथ जोड़ कर इसे देखा जाये तो इसका एक चित्र उभर पाने में मदद मिल सकेगी|

इस सन्दर्भ मे मैंने कुछ स्कूलों में बच्चों के साथ इस काम को कर के देखा था| इस काम मे मैंने अवलोकन (osbervation)का तरीका इस्तेमाल किया था| इसके लिए थोडा लम्बा समय याने लगभग डेढ़ हफ्ते तक बच्चे चन्द्रमा के अवलोकन ले कर उन्हें दर्ज करते रहे थे| इन अवलोकनों में उन्हें चन्द्रमा की आकाश में स्तिथि साथ मे सूर्य से उसकी दुरी को भी देखना था| यह अवलोकन उन बच्चों ने शुक्ल पक्ष में किये थे, जिसमें चन्द्रमा का आकार बढ़ते जाता है| उन्हें इन अवलोकनों को दर्ज करने के लिए मैंने एक अवलोकन तालिका (ऑब्जरवेशन टेबल) दि थी| बच्चों ने काफी अच्छे अवलोकन किये थे| चन्द्रमा का हर दिन का आकार, उसकी आकाश में स्थिती और सूर्य से दुरी के अवलोकन थे| फिर एक शाम मैंने बच्चों के हर दिन के अवलोकनों को जोड़ते हुए बात करी की कैसे चन्द्रमा का आकार बढ़ता जाता है और साथ में उसकी दुरी भी सूर्य से आकाश में बढती जाती है| हर दिन चन्द्रमा सूर्य से दूर आकाश में पूर्व दिशा की ओर बढ़ता है| यहाँ उन्हें चाँद की दो गतियाँ पता चली थी| पहली पृथ्वी के घूर्णन की वजह से आकाश में पूर्व से पश्चिम और दूसरी चन्द्रमा खुद की कक्षा में होने वाली गति जो थी पश्चिम से पूर्व|

चाँद पर सूरज की रोशनी गिरती रहती है और इसी वजह से उस पर भी दिन रात होते है| चाँद के चमकीले हिस्से पर दिन होता है और जो हिस्सा अँधेरा होता है वह रात होती है| चाँद अपनी कक्षा में आगे बढ़ता है वैसे चाँद पृथ्वी और सूर्य के बीच बदलते कोण की वजह से उसका चमकीला भाग हमे कम ज्यादा मात्रा में दिखता है| हमारे पास चाँद के शुक्ल पक्ष के सप्तमी से लेकर कृष्ण पक्ष की द्वितीया तक के अवलोकन थे| लगभग ठीक ठाक डाटा था चाँद की कलाओं को समझने के लिए | चन्द्रमा के घटते बढ़ाते आकार को समझाने के किये मैंने एक सिम्युलेटर सॉफ्टवेर का उपयोग किया था |

चन्द्रमा की कलाएं,  source wikipedia


चाँद हमारी धरती के चक्कर पृथ्वी के इर्दगिर्द काटता है| उसके इस मार्ग को हम कक्षा कहते है| इसे धरती का एक चक्कर पूरा करने में लगभग एक महीना लग जाता है| अगर हम हमारे अवलोकन में पहले चाँद की स्थिति को देखे तो उसकी कक्षा में लगभग 3 क्रमांक की स्थिति पर था| तो आकाश में अर्धगोल के आकार का दिख रहा था और एक खास समय विशिष्ट तारो के साथ दिखाई दे रहा था| पर जैसे उसकी स्थिति उसकी कक्षा में बदलती है तो आकाश में हमे वो दुसरे तारो के साथ दिखाई देने लगता है| साथ ही में उसके आकाश में आने का समय भी बदल जाता है| चित्र में हम देख पाएंगे की चाँद का सूरज के तरफ का हिस्सा चमकीला है वह दिन है| क्रमांक 3 की स्थिती में हमे उसके आधे चमकते और आधे अँधेरे हिस्से को देख पा रहे है| जैसे 4 क्रमांक की स्थिति पर जाता है , तब हमे उसका चमकीला हिस्सा ज्यादा दिखाई देता है| जब वह 5 क्रमांक की स्थिति पर आता है, तब हम उसका पूरा चमकीला हिस्सा देख पाते है जो हमे आकाश में पूरा गोल दिखाई देता है| यह पूर्णिमा की स्थिति है|

चन्द्रमा की कक्षा में आगे बढाती हुयी स्थिती और दिखनेवाली चन्द्र कलाएं, source form Wikipedia images 
अब पूर्णिमा के बाद चाँद थोडा देरी से आसमान में आने लगता है| बच्चों ने इस चाँद को भी देखा था| अब ये चाँद तो सुबह सूर्योदय के वक़्त तक आसमान में दिखाई देता है, फिर इसका अस्त होता है| आगे आने वाले कुछ दिनों में चाँद का आकार और छोटा होता जाता है और उसका अस्त हम दिन में ही देख पाते है और सूर्य और चाँद के बीच की दुरी और कम होती जाती है और जब चाँद अपनी कक्षा में 9 क्रमांक की स्थिति पर होगा तब आकाश में सूरज के पास होगा और इसे देखना मुश्किल हो जायेगा| उस दिन रात में चाँद नहीं दिखेगा और वह होगी अमावस| यह चक्र ऐसाही चलता रहता है|

जब मैं इन कलाओं के बारे में बातचीत आर रहा था तब बच्चे अपने अवलोकनों के साथ इसे जोड़ कर देख रहा थे| उनके अवलोकनों ने उन्हें चन्द्रमा की कलाओं के बारे में समझने मे मदद करी|

विज्ञान में अक्सर यही किया जाता है की वैज्ञानिक उनके अवलोकनों के आधार पर एक चित्र खड़ा करते है जिन्हें मॉडल कहा जाता है| यह मॉडल हमें उस घटना के तथ्यों के पास ले कर जाता है| ऐसे कई मॉडल्स विज्ञान में बनाये जाते है| यह मॉडल्स अवलोकनों के आधार पर खड़े होते है| लेकिन जरुरी नहीं की यह मॉडल्स हर एक व्यक्ति को उस घटना को समझा पाने में या कल्पना करने में मदद करे| और स्कूल के किताबों में अक्सर यही किया जाता है की विज्ञान को ऐसे मॉडल्स के जरिये पढाया या समझाया जाता है| जब की होना ये चाहिए की बच्चों के अवलोकनों के आधार पर मॉडल बनाये जाये| जो की विज्ञान की अवधारणाओं (concepts) को मजबूत करने में मदद करे| चन्द्रमा की कलाएं भी ऐसे ही एक मॉडल का उदाहरण है, जिसे सिर्फ मॉडल से नहीं बल्कि अवलोकनों से समझ सकते है|