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Tuesday, June 23, 2020

अविस्मरणीय... सूरतगढ़ का सूर्य ग्रहण



“गज़ब!!!”
“जबरदस्त!!!”
“वाऊ, फैंटास्टिक!!!”
जब चन्द्रमा सूरज के बिल्कुल सामने आ गया और रिंग ऑफ़ फायर नुमा नज़ारा बन गया तब यही अल्फाज़ हमारे मुंह से निकले| वलयाकार सूर्यग्रहण का ऐसा नज़ारा देखकर हम सभी रोमांचित हो गए थे| ऐसा नहीं है कि मैंने पहले कभी वलयाकार ग्रहण नहीं देखा है| पहले भी ऐसा ग्रहण मैंने देखा है, लेकिन इस बार जो देखा वह कमाल का था| 21 जून 2020 का वलयाकार सूर्यग्रहण भारत से बहुत कम हिस्से से देखा गया| अफ्रीका से शुरू होकर सऊदी अरब और दक्षिण पाकिस्तान से गुजरनेवाली चन्द्रमा की छाया भारत के उत्तरी राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड से गुजरी| आगे यह छाया तिब्बत, चीन से होकर प्रशांत महासागर में खत्म हुयी|
21 जून 2020 का वलयाकार सूर्य ग्रहण

इस साल का यह पहला सूर्य ग्रहण था और काफी ख़ास भी| वह इसलिए भी क्यूंकि इस दशक में भारत से दो वलयाकार ग्रहण दिखे और यह आखिरी था| अब भारत से अगला वलयाकार सूर्यग्रहण 21 मई 2031 में यानी ग्यारह साल बाद दिखेगा| दूसरे यह ग्रहण इसलिए भी ख़ास था क्यूंकि यह ऐसे समय हो रहा था जब पूरी दुनिया के साथ साथ भारत में भी कोरोना महामारी फैली थी| वैसे तो सूर्यग्रहण के नज़ारे देखने के लिए दुनियाभर से लोग उन जगहों पर पहुँचते हैं जहां से सुर्यग्रहण दिखानेवाला हो| लेकिन इस साल दुनिया थम सी गयी थी| एक्का-दुक्का लोग ही उन जगहों पर पहुँच पायें जहां से इसे देखा जाना था|
आकाशमित्र के साथ मैंने भी इसे देखने की तैयारियां छह महीने पहले शुरू कर दी थी| टिकट बुकिंग, प्लान, कहाँ जाना है, कब जाना है, सब कुछ| पर मार्च महीने के आते-आते भारत में कोरोना महामारी ने पैर पसारना शुरू कर दिए और भारत में भी लॉकडाउन के ताले लग गए, ताकि इस बीमारी को फ़ैलाने से रोका जाए| हमे फिर भी उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद शायद बीमारी रुक जाए तो हमे सूर्यग्रहण देखने का मौका मिल जायेगा| लेकिन जैसे जैसे वक़्त बीतता गया यह महामारी बढती ही गयी और हमारी ग्रहण देखने की उम्मीदे कम हो गयी| मार्च, अप्रैल मई पुरे देश में आवाजाही बंद रही| दुनिया के हालत बद से बदतर हो रहे थे| लेकिन जून में देश की कई राज्य सरकारों ने लॉकडाउन को अनलॉक किया और आवाजाही शुरू हो गयी|
ग्रहण देखने की थोड़ी उम्मीद तो बढ़ी लेकिन फैलती बीमारी से हिम्मत तो नहीं बढ़ रही थी| कोशिशें फिर भी जारी थीं| हालांकि अब हमारी ग्रहण देखने की जगह बदल गयी थी| आकाशमित्र के दो साथी मनोज जी और शिशिर लगातार मेरे संपर्क में थे| प्रयास था कि राजस्थान के किसी इलाके से इसे देखा जाये| मैं भी जगह ढूंढ रहा था| राजस्थान के सूरतगढ़ के मेरे दोस्त गौरव से बातचीत हुई क्यूंकि जिस इलाके से ग्रहण गुजरने वाला था उसमे सूरतगढ़ भी शामिल था| लेकिन पल पल बदलती परिस्थितियां किसी भी प्लान को टिकने नहीं दे रही थी| एक दिन कुछ स्थानीय सरकारी अधिकारियों से बातचीत कर रहे थे तो उन्होंने राजस्थान सरकार के राज्य की सीमा को बंद करने के आदेश दिखाए| उम्मीद पर एक बार पुनः पानी फिर गया| मनोज जी से बात हुयी उन्होंने कहा कि हम नहीं आ पाए तो तुम जरुर चले जाना|
एक दिन बाद स्थानीय सरकारी अधिकारी ने मेसेज भेजा कि सरकार ने राज्य सीमाएं फिर से खोल दी है और बाहर से आनेवाले किसी को अब नहीं रोका जायेगा| अब शिशिर और मनोज जी को मैंने कहा कि वे आ सकते हैं|
सूरतगढ़ राजस्थान का एकमात्र शहर था जो सभी तरह के लॉकडाउन में ग्रीन ज़ोन बना रहा था| लेकिन आगे की परिस्थितियां हम भी नहीं जानते थे| सूरतगढ़ के दोस्त के साथ मिलकर कुछ व्यवस्थाएं बनायीं| शुक्रवार की सुबह से दोपहर तक हमारा प्लान बिगड़ते बिगड़ते वापस पटरी पर आया| शिशिर और मनोज जी पुलिस और मेडिकल क्लीयरन्स लिया और चल पड़े| रात का सफर तय कर के उन्हें सुबह सिरोही पहुँचे|
फिर हम तीनों निकल पड़े सूरतगढ़ की ओर| दिन भर की गर्मी में की गयी यात्रा काफी थकान भरी रही| हमने उस रात होटल में रहने का फैसला किया| वैसे साथ में टेंट भी था लेकिन सूरतगढ़ की गर्मी के सामने हमारी टेंट में रहने की हिम्मत नहीं बनी| हालांकि मन में दुविधा भी थी लेकिन थकान और गर्मी के सामने दुविधा कमजोर पड गयी| मेरे मित्र का भाई सौरव हमसे मिलने आया था| हम भी सोच रहे थे कि कहाँ से ग्रहण को देखे| हम यह नहीं चाहते थे कि किसी के संपर्क में आये, तो कोई ऐसे जगह की पूछताछ हमने उससे की| उसने कहा कि भाईसा, ग्रहण के दिन कोई बाहर नहीं निकलेगा तो भीड़ की चिंता तो आप छोड़ दीजिये लेकिन यहाँ आसपास तो सिर्फ रेत के टिब्बे हैं| इस समय भरी गर्मी में रेत के टिब्बों पर से ग्रहण देखना मुश्किल है और आपको आसपास कोई छांव भी नहीं मिलेगी| बेहतर होगा कि आप होटल की छत से ही देख लो| यह उपाय भी ठीक था हमे पसंद भी आया क्योंकि आते वक्त की गर्मी हम झेल चुके थे|  तय हुआ कल का ग्रहण होटल की छत से देखा जाये|
सुबह तड़के ही हम उठ गए ऊपर छत पर गए तो देखा की आसमान में बादल ही बादल फैले हैं और शहर के आसमान  पर धुल की चादर भी थी| शायद रात को रेत की आंधी आई हो| मन में विचार आया कि इतनी दूर आ कर क्या ग्रहण देख पाएंगे? शिशिर ने झट से मौसम विभाग की साईट देखी तो सॅटॅलाइट इमेज में काफी दूर तक बादल दिख रहे थे| लेकिन हवा भी चल रही थी| घंटे भर में बादल हटना शुरू हुए| हमने भी तैयारी शरू कर दी| सुबह 10 बजे के करीब हम छत पर पहुँच गए| आसमान एकदम साफ़ हो गया था|
करीब 10 बज कर 15 मिनट पर चन्द्रमा ने सूर्य के पश्चिमी किनारे को छुआ| ऐसे लगा कि सूरज की सुनहरी थाली का एक टुकड़ा टूट हो गया हो| धीरे धीरे चन्द्रमा सूर्य को ढंकने लगा| सूरज की रोशनी में गिरावट लगातार दिख रही थी| इस दरमियान कुछ पत्रकारों को खबर लग गयी थी कि कुछ लोग सूर्यग्रहण देखने सूरतगढ़ आये हैं| वे हमसे आकर मिले| लेकिन अन्दर से हमे लग रहा था कि शायद हमे इनसे बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम बहुत दूर से ऐसे महामारी के समय आये हैं| हम नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह के संक्रमण की वजह या तो हम या तो वे लोग बने| पर ग्रहण जैसी घटना को उन लोगों तक पहुँचाना भी जरुरी लगा जो घरों में छिपे बैठे थे| ऐसे में उनसे भी उचित दूरी बनाकर बातचीत की| उन्होंने भी ग्रहण के चश्मों से ग्रहण देखा| अंधविश्वास पर भी उनसे बात हुयी| भरे ग्रहण में सब ने पानी भी पिया|
सूर्य के सामने आता हुआ चन्द्रमा

पत्रकारों से बात करने के दौरान कुछ सवाल आये थे जैसे क्या इस ग्रहण का कोरोना महामारी के साथ कोई सम्बन्ध है? 2020 साल बहोत बुरा रहा क्या इस ग्रहण की वजह से और भी मुश्किलें बढ़ेंगी क्या? ग्रहण की छाया अशुभ होती है क्या? वैसे तो इस तरह के सवाल ग्रहण के दौरान काफी पूछे जाते है| लेकिन जब इस पर बात होती है कि सूर्य और चन्द्रमा एक दुसरे के आमने सामने आते हैं तो ग्रहण होता है इसका शुभ अशुभ से कोई नाता नहीं है| कई सारे लोग इस बात में हाँ भी मिलाते हैं| यह भी मानते हैं कि सूर्य के सामने चन्द्रमा आता है उसकी छाया पृथ्वी पर पड़ती है कोई शुभ अशुभ नहीं होता| लेकिन ग्रहण के वक्त यही लोग घरों में छुपकर बैठते हैं और सभी तरह के धार्मिक कर्मकांड करते हैं|
अब तो 2020 साल को भी बुरे साल कि उपाधि मिल गयी है| कुछ लोगों के अनुसार सभी तरह की बुरी घटनाये ये साल लाया और उसपर यह ग्रहण भी| इस तरह की मान्यताएं पहले भी समाज रह चुकी है| ग्रहण दिखने या धूमकेतु दिखने पर किसी राजा की मौत के होने या महामारियों का फैलने से जोड़ दिया जाता है| ग्रहण को ईश्वर का प्रकोप या चेतावनी मानने वालों की संख्या कभी कम नहीं रही है| लेकिन विज्ञान की खोज़ से यह साफ हो चुका है कि मानव या मानवीय समाज में घटने वाली घटनाओं के पीछे किसी भी खगोलीय पिंडो या घटनाओं की भूमिका नहीं होती| महामारियां सूक्ष्मजीवों से फैलती है न की ग्रहण की वजह से और ना ही महामारियों को ग्रहण की वजह से फैलने में बल मिलता है| यह तो प्राकृतिक घटनाएँ है|  
रिंग ऑफ़ फायर के कुछ हिस्से चन्द्रमा के पहाड़ों की वजह से टूटे हुए दिख रहे है|

अग्निवलय के बाद की स्तिथि

जैसे जैसे ग्रहण की घडी समीप आने लगी वैसे हम और भी सतर्क हो गए| सूर्य के सामने अब धीरे-धीरे चन्द्रमा आने लगा| चन्द्रमा का आकार सूर्य के आकार से थोड़ा सा ही कम था| रोशनी में तेजी से गिरावट आ गयी| रोशनी एकदम तो बंद नहीं हुयी लेकिन लगभग शाम जैसा माहौल हो गया| 11 बजकर 52 पर सूर्य के सामने चन्द्रमा पूरी तरह आ गया| लेकिन चन्द्रमा जरा सा छोटा होने की वजह से सूर्य का जरा सा बाहरी हिस्सा खुला रह गया और एक अग्नि-वलय बन गया| इस वलय की मोटाई पिछले वलयाकार सूर्य ग्रहणों से काफी छोटी थी| चन्द्रमा के दक्षिणी हिस्से के ऊँचे पर्वतों की वजह से इस वलय का कुछ हिस्सा टुटा हुआ सा लग रहा था| हमारे पास बस यही अल्फाज़ थे बेहद शानदार और खुबसूरत| यही वह नज़ारा जिसने हमारी यात्रा को सफल बनाया| कुछ की सेकंड्स में चन्द्रमा सूर्य के सामने से थोड़ा सा हट गया और अग्नि-वलय दिखना बंद हो गया| धीरे-धीरे चन्द्रमा सूर्य के सामने से गुजरता हुआ पूर्व की ओर बढ़ रहा था| अब फिर से सूर्य की रोशनी बढ़ रही थी और तापमान भी| 1 बज कर 50 मिनट पर चन्द्रमा सूर्य के सामने से पूरी तरह से हट गया था| इतनी दूर आकर ग्रहण के समय चन्द्रमा के पहाड़ और अग्नि-वलय देखना काफी मजेदार अनुभव था|
सूरतगढ़ की वीरान पड़ी सड़के
 
तुरंत हम लोगों ने खाना खाकर सूरतगढ़ से विदाई ली| आज के दिन सूरतगढ़ का माहौल काफी अलग था| कल के दिन जब सूरतगढ़ आये थे तब वहा काफी चहल-पहल थी, मार्किट खुले थे, काफी लोग आम दिनों जैसे ही घूम रहे थे| लेकिन आज तो मार्किट की एक भी दुकान खुली नहीं थी| सड़के भी वीरान पड़ी थी| ग्रहण के दिन में आज भी भारत में यह आम बात है| यह भी बड़ी विडम्बना है कि आज कोरोना महामारी के समय हर एक व्यक्ति इस बीमारी से इजात पाने के लिए विज्ञान की तरफ आस लगाकर बैठा है और एक तरफ वो ग्रहणों को अशुभ मानकर घर में ईश्वर की पूजा में भी बैठा है| पढ़े लिखे समाज में आज इस दुविधा को काफी आसानी से देखा जा सकता है|
खैर महामारी के ऐसे समय में देखा गया यह ग्रहण हमारे लिए हमेशा यादगार रहेगा|

Saturday, July 28, 2018

Pictures from the Lunar Eclipse of the century

There were much talk about this Lunar eclipse because it was very special for this century. It was the longest total lunar eclipse of the century. Eclipses happens in June, July, August and September are usually depends upon the mercy of monsoon clouds. I remember many eclipses which washes in the Monsoon clouds. I have never witnessed Total Solar Eclipse. Shadow of the moon on earth surface is very small so it could visible from small geographical belt. On 22 July I was in that shadow belt, but monsoon clouds covered this show on that day. 

This time also I was feeling that, there are chances of happening this events under clouds only. From entire day sky was covering with thick clouds of monsoon. But, astronomy is full of surprises you never expect what will happen. This time when partial eclipse was going to start means around 11:45 pm I just peek out side and saw clouds were started getting clear and full moon appeared with bright red planet shining near to it. It was sudden. Then I immediately, take out my simple camera, DSLR camera. Binocular, camera stand, mobile and telescope. I just wanted to get ready with whatever came in my hand 😄. 

I got few good pictures from camera and did some telescopic observations. on the same day Mars was also in opposition to earth. Mars shining big brightly near to eclipsing moon. I took time to observe this red planet. It was very windy so mars detail was not visible clearly through telescope but if sky condition get settle in coming days then mars will be the great object to observe for next days. 

When moon moved into umbra of earth it turned into red. This time red color was bit darker from last 31 January eclipse. But it was great to see both Mars and Red Moon together. how many time we will get such opportunity. I struggle with my camera setting to capture this red pair. For an hour was awake. Then, clouds started gathering after giving good two and half hour of clear sky. I could see half of the eclipse part but it was great to observe and capture it. Here, are some clicks from the eclipse. 








The red pair of Planet Mars and eclipsed Moon

Monday, June 11, 2018

ग्रहण, अंधविश्वासों का वैज्ञानिक सहारा


आज जो बाते मैं आपके साथ साझा करने वाला हूँ , ये बातें मैंने ग्रहण संबंधी अलग अलग कार्यक्रमों के दौरान शिक्षक और विद्यार्थिओं से की है| अक्सर जब कोई खगोलीय घटना होनी होती है, तब हम शिक्षक, विद्यार्थी और समुदाय में ऐसी घटनाओं को लेकर कुछ जागरुकता एवं सजगता के लिए कार्यक्रम करते है| ग्रहण जैसी खगोलीय घटना को लेकर ज्यादातर लोगों में भय होता है| साथ ही लोगों का कुछ मान्यताओं पर भी गहरा विश्वास होता है | इससे जुड़ा हुआ एक अनुभव में आपको बताना चाहूँगा | गत वर्ष की बात है, जब राखीपूर्णिमा थी | मैं बाज़ार से गुज़र रहा था कि तभी मैंने देखा दो बाइक सवार एक दुसरे से भीड़ गए| दोनो बाइक सवार गिर गए | उन्हें लोगों ने उठाया और पूछताछ की कि भाई कही लगी तो नहीं, कहाँ जा रहे थे इतनी तेज़ी से? जवाब था, “जी, ग्रहण शुरू होने वाला है तो उससे पहले ही राखी बंधवानी थी, देर हो रही थी इसीलिए तेज़ी से जा रहे थे |” आप समझ ही सकते है की किस प्रकार लोग ग्रहण को अशुभ मानते है और शुभ समझे जाने वाले धार्मिक विधिओं को ग्रहण में करना नहीं चाहते| सिर्फ धार्मिक विधियाँ ही नहीं किसी भी प्रकार के दैनिक कार्य भी लोग ग्रहण समय में नहीं करते | इसके अलावा भी कई प्रकार के अंधविश्वास ग्रहण को लेकर आमजन मे व्याप्त है।  


पूर्ण सूर्यग्रहण image source: internet
इसके पीछे की वजह अगर हम देखना चाहे तो, पुराने समय से मनुष्य ने प्रकृति में एक व्यवस्थित संचालन को देखा है | यह संचालन सूर्य का उदय और अस्त होना, दिन रात का बनना, चन्द्र का घटना बढ़ना (कलाएं), ऋतुओं का आना जाना, सब एक नियत क्रम में होता है | पर कभी-कभी इन नियमित चलने वाली घटनाओ में व्यवधान आते है | जैसे जब किसी दिन आकाश में सूर्य पूरी चमक से मार्गक्रम करता है और तभी उसकी रोशनी कम होते होते अँधेरा छा जाता है तो लगता है जैसे सृष्टि का चक्र गड़बड़ा गया हो | जाहिर सी बात है, जब मनुष्यों के खोजबीन के तरीकों में वैज्ञानिक जाँच पड़ताल नहीं थी, तब इसका कारण किसी दैवीय या असुरी शक्ति को मान लिया जाता था| ऐसा ही चंद्रग्रहण के दौरान भी होता था| चन्द्रमा की चमक फीकी पड़कर वह लाल रंग का हो जाता था | ग्रहणों को दुनिया भर की सभ्यताओं में एक बुरी घटना के रूप में ही देखा जाता था और आज भी देखा जाता है|


दुनियाभर में ग्रहण को एक बुरी घटना के रूप में देखा जाता था, क्योंकि इन्सान इसके वास्तविक कारणों को नहीं जानते थे | image source, internet
ग्रहण के पीछे के कारण के रूप में भारत में एक कहानी सुनने को मिलती है | समुद्र मंथन के वक़्त जब अमृत कलश निकला तब असुरों ने इस पर अपना हक़ बताया | असुर अगर अमृत पी गए तो अमर हो जायेंगे, यह देवों को मंजूर न था | तब विष्णु ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर असुरों को मोहित कर लिया | विष्णु के स्त्री रूप मोहिनी से असुरों ने अमृत कलश विष्णु को सौंप दिया | विष्णु जब देवों को अमृत बांटने लगे, तब एक असुर राहू, जिसे विष्णु की चाल समझ आ गयी थी, वह भी देवों की पंक्ति में आ कर बैठ गया| उसे भी अमृत दिया गया | लेकिन सूर्य-चन्द्र ने उसे पहचान कर विष्णु को बता दिया | विष्णु ने अपने चक्र से उसका सर धड से अलग कर दिया लेकिन तब तक तो राहू अमृत पी कर अमर हो चुका था| वह वैसे ही दो टुकड़ो में जिन्दा रहा जहां शरीर के सर वाले हिस्से को राहू और धड वाले हिस्से को केतु कहा गया | कहा जाता है की राहू, सूर्य और चन्द्र से उन्हें ग्रास कर (खा कर) बदला लेता है |


इस कहानी में राहू, सूर्य और चन्द्रमा की वजह से देवों की पंक्ति में मारा गया |  image source internet
ग्रहण के दौरान लोग सूर्य चन्द्र की राहू-केतु से मुक्ति के लिए तरह तरह की चीजें करते है | जैसे शोर मचाते है, ढोल बजाते है, जिससे जो भी असुरी शक्ति है वह सूर्य चन्द्र को छोड़ दे | यज्ञ – हवन, पूजा पाठ किये जाते है | भगवानों की मूर्तियों को ढका जाता है या फिर पानी में रखा जाता है, ताकि राहू और केतु की छाया भगवान पर न गिरे | लोग इन राहू केतु को सच मानते है और इनसे डरते भी है | लेकिन वास्तव में देखा जाये तो राहू केतु से ग्रहण नहीं होते| सूर्य को ग्रहण तब लगता है जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आता है | सूर्य और चन्द्र हमारे आकाश में लगभग एक ही आकार के दिखते है इसलिए चन्द्र सूर्य को ढक पाता है| सूर्य के सामने आने की वजह से चन्द्रमा की छाया बनती है और धरती पर जिस जगह वह गिरती है वहा से लोग सूर्यग्रहण देख पाते है | चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी आ जाती है और धरती की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है | जिन छायाओं को अशुभ समझा जाता है वास्तव में ये छायाएं चन्द्र और पृथ्वी की होती है। जिन्हें राहू और केतु समझा जाता है, वे असल मे काल्पनिक गणितीय बिंदु है| चन्द्रमा की कक्षा, पृथ्वी-सूर्य के तल को दो बिन्दुओं में छेदती है | यह छेदन बिंदु ही है राहू (Ascending node) और केतु (Descending node)| यह कोई वास्तविक पिंड नहीं है | इन बिन्दुओं पर सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के सामने या विरुद्ध आते है और ग्रहण की स्थितियां बनती है |


राहू और केतु काल्पनिक गणितीय बिंदु है, जहाँ चन्द्रमा की कक्षा, पृथ्वी-सूर्य के तल को दो बिन्दुओं में छेदती है | image source internet
ग्रहण के दौरान लोग ग्रहण छाया से पानी और खाने आदि को बचाने के लिए कुछ शुध्द समझी जाने वाली वनस्पति का इस्तेमाल भी करते है | जैसे भारत के कुछ हिस्से में पानी में तुलसी पत्र रखा जाता है | अगर खाने पीने की चीजों पर तुलसीपत्र नहीं रखा गया तो माना जाता है की ग्रहण छाया से यह अशुद्ध हो गया है और उन चीजों को फेंक दिया जाता है | काफी बार यह भी कहा जाता है की हमारे पुराण में विज्ञान है | ग्रहण समय पर खाने पीने की चीजों पर तुलसीपत्र रखे जाने के पीछे कारण दिया जाता है की सूर्य चन्द्र की रोशनी जिस समय पृथ्वी पर नहीं रहती है, उस समय खाने पीने की चीजो में जीवाणु पनप जाते है | हर धर्म में लोग यह कोशिश करते है की किस तरह उनके धर्म या परम्पराओं में विज्ञान है | लेकिन यह जाने बिना की आज के विज्ञान की नीव जिन प्रयोगों के आधारों पर खडी है, वे ऐसे दावों को खोखला साबित कर देते है | विज्ञान कहता है की जीवाणु उन परिस्थितिओं में पनपते है जो उनके लिए उपयुक्त होती है | जैसे सही तापमान, नमी और उनके भोजन की उपलब्धता | हमारे खाने में जीवाणु कभी भी पनप सकते है | गर्मियों और बरसात के वक्त खाने में तुलसीपत्र रखने पर भी खाने में जीवाणु पनप सकते है | जीवाणुओं को पनपने के लिए अगर सिर्फ कम रोशनी चाहिए होती तो पृथ्वी पर  ऐसी परिस्थिति हर रोज लगभग बारह घंटे रात के समय होती है| लेकिन मनुष्य को तो कभी ऐसी जीवाणुओं की भरमार का सामना नही करना पड़ा| हमारे खाने पीने की चीजे सिर्फ ग्रहण में दूषित होती यह समझना गलत है |

पढ़े लिखे लोगों  मे भी ऐसे विश्वास पाये जाते है जो इन धारणाओं को आसानी से नहीं छोड़ते | एक स्कूल में ग्रहण के बारे में बच्चों से बातचीत कर रहा था| पूरी बात हो गयी | उनके शिक्षक जो भूगोल पढ़े हुए थे, जो जानते थे की कैसे ग्रहण महज परछाई का खेल होते है , उनका कहना यह था की “भाई ठीक है विज्ञान जो कहता है सो तो है, लेकिन हमारे पूर्वज जो करते थे उसके पीछे कोई तर्क तो होगा| तो क्यूँ नहीं सिर्फ सेफ साइड के लिए हमे खाने पीने की चीजों पर तुलसीपत्र रखना चाहिए |” यहीं गड़बड़ हो जाती है | हम मानते है की हमारे पूर्वज सब जानते थे, लेकिन यह मानने में भी बुराई नहीं की हमारे पूर्वज सब चीजे नहीं जानते थे | सिर्फ सेफ साइड रखने के लिए हम फिर से उन अंधविश्वासों को मजबूत बनाने का ही काम करते है जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है| जब ग्रहण होता है, तो चन्द्रमा की छाया धरती के एक बड़े हिस्से पर गिरती है| जहाँ नदियां, तालाब, खेत और वन होते है | क्या ग्रहण की छाया से यह दूषित हो जाते है? और क्या किसी वनस्पति से पृथ्वी के इतने बड़े भूभाग को शुद्ध किया जा सकता है? हम इसी भू-भाग के संसाधनों को ही ग्रहण के बाद उपयोग में लाते है| वास्तव में मनुष्य सृष्टि पर अपना अधिकार जता कर उसकी ग्रहण से रक्षा करने की चेष्टा करता है, पर देखा जाए तो यह खुद की हंसी उड़ाने जैसा है |


ग्रहण को एक प्राकृतिक घटना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए| image source internet
एक और भ्रान्ति के समर्थन में वैज्ञानिक कारणों का सहारा जाता है | गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान बाहर नहीं जाना चाहिए क्योंकि ग्रहण के दौरान हानिकारक रेडिएशन धरती पर आता है | दावा करनेवाले कहते है की, वैज्ञानिक भी इसे मानते है और इसीलिए ग्रहण देखने से मना करते है | वैसे वैज्ञानिको का दावा किसी और ही परिपेक्ष से है | हानिकारक रेडिएशन की बात करे तो जब भी हमारे आकाश में सूर्य होता है, तब भी बड़ी मात्रा मे हानिकारक रेडिएशन धरती पर आता रहता है| सामान्य दिन के सूर्य को भी देखना हानिकारक होता है | ग्रहण के सूर्य से भी यही रेडिएशन आता है | लेकिन वैज्ञानिक ग्रहण को देखने से मना नहीं करते | वे सिर्फ यही कहते है की आप ग्रहण के फ़िल्टर चश्मों से इसे देखिये |  चन्द्रमा का तो अपना खुद का प्रकाश नहीं है तो उससे हानिकारक रेडिएशन आने कि कोई संभावना ही नहीं | जब चंद्रग्रहण होता है तो चन्द्रमा खुद पृथ्वी की छाया में चला जाता है तो यहाँ किसी भी प्रकार का रेडिएशन नहीं आता | विज्ञान की उथली समझ रखने वाले लोगों ने इन मान्यताओं में आम लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए विज्ञान का बिना सोचे समझे इस्तेमाल किया है |

ऐसी घटनाओं के दौरान सबसे ज्यादा आतंक टीवी न्यूज़ चैनल और अखबार फैलाते है | अपना TRP बढाने के लिए किसी बाबा या साधू को बुलाकर किस तरह से ग्रहण के मनुष्य जीवन पर परिणाम होंगे, इसे बताया जाता है | सबसे ज्यादा अंधविश्वास ऐसे समय में न्यूज़ मीडिया द्वारा फैलाया जाता है | इन्हें देखने वाला दर्शक वर्ग इससे प्रभावित होता है | ऐसे समय में न्यूज़ मीडिया को जिम्मेदारीपूर्ण काम करते हुए, इसके असली कारणों के बारें में लोगों को बताना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसे देखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए |


मेरे मित्र ने यह कार्टून मुझे whatsapp पर भेजा था, आज का सच है |
शिक्षक क्या कर सकते है ? बच्चों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए यह एक अच्छा अवसर होता है |  अगली बार किस तारीख को ग्रहण होने वाला है, इसका क्या अर्थ है, यदि इस प्रकार कि चर्चा व इसके पीछे क्या वैज्ञानिक कारण है यदि विद्यार्थियों को बताया जाए तो यह उनके लिए ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा। मनुष्यों ने काफी समय प्रकृति की इस घटना का अवलोकन किया, चन्द्र सूर्य पृथ्वी के गति का अवलोकन किया और उन्हें गणितीय सूत्रों में बाँधा और बताया की अगली बार कब होगा | ग्रहण कोई दैवीय घटना नहीं है जो किसी अलौकिक शक्ति की मर्जी से होता हो | ग्रहण सिर्फ एक प्राकृतिक घटना है | विज्ञान के अवलोकन, अध्ययन, तार्किकता हमे प्रकृति में घटने वाली घटनाओं के पीछे के सही कारण पता करने की क्षमता देता है | वैज्ञानिक सोच हमे प्रश्न करना सिखाती है | इस सोच के साथ हम हमारे विद्यार्थिओं को रुढ़िवादी विचार और और अन्धविश्वासों पर प्रश्न करना सिखा सकते है |

बच्चों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए यह ग्रहण अच्छा अवसर होता है | image source internet