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Tuesday, June 23, 2020

अविस्मरणीय... सूरतगढ़ का सूर्य ग्रहण



गज़ब!!!
जबरदस्त!!!
वाऊ, फैंटास्टिक!!!
जब चन्द्रमा सूरज के बिल्कुल सामने आ गया और रिंग ऑफ़ फायर नुमा नज़ारा बन गया तब यही अल्फाज़ हमारे मुंह से निकले| वलयाकार सूर्यग्रहण का ऐसा नज़ारा देखकर हम सभी रोमांचित हो गए थे| ऐसा नहीं है कि मैंने पहले कभी वलयाकार ग्रहण नहीं देखा है| पहले भी ऐसा ग्रहण मैंने देखा है, लेकिन इस बार जो देखा वह कमाल का था| 21 जून 2020 का वलयाकार सूर्यग्रहण भारत से बहुत कम हिस्से से देखा गया| अफ्रीका से शुरू होकर सऊदी अरब और दक्षिण पाकिस्तान से गुजरनेवाली चन्द्रमा की छाया भारत के उत्तरी राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड से गुजरी| आगे यह छाया तिब्बत, चीन से होकर प्रशांत महासागर में खत्म हुयी|
21 जून 2020 का वलयाकार सूर्य ग्रहण

इस साल का यह पहला सूर्य ग्रहण था और काफी ख़ास भी| वह इसलिए भी क्यूंकि इस दशक में भारत से दो वलयाकार ग्रहण दिखे और यह आखिरी था| अब भारत से अगला वलयाकार सूर्यग्रहण 21 मई 2031 में यानी ग्यारह साल बाद दिखेगा| दूसरे यह ग्रहण इसलिए भी ख़ास था क्यूंकि यह ऐसे समय हो रहा था जब पूरी दुनिया के साथ साथ भारत में भी कोरोना महामारी फैली थी| वैसे तो सूर्यग्रहण के नज़ारे देखने के लिए दुनियाभर से लोग उन जगहों पर पहुँचते हैं जहां से सुर्यग्रहण दिखानेवाला हो| लेकिन इस साल दुनिया थम सी गयी थी| एक्का-दुक्का लोग ही उन जगहों पर पहुँच पायें जहां से इसे देखा जाना था|
आकाशमित्र के साथ मैंने भी इसे देखने की तैयारियां छह महीने पहले शुरू कर दी थी| टिकट बुकिंग, प्लान, कहाँ जाना है, कब जाना है, सब कुछ| पर मार्च महीने के आते-आते भारत में कोरोना महामारी ने पैर पसारना शुरू कर दिए और भारत में भी लॉकडाउन के ताले लग गए, ताकि इस बीमारी को फ़ैलाने से रोका जाए| हमे फिर भी उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद शायद बीमारी रुक जाए तो हमे सूर्यग्रहण देखने का मौका मिल जायेगा| लेकिन जैसे जैसे वक़्त बीतता गया यह महामारी बढती ही गयी और हमारी ग्रहण देखने की उम्मीदे कम हो गयी| मार्च, अप्रैल मई पुरे देश में आवाजाही बंद रही| दुनिया के हालत बद से बदतर हो रहे थे| लेकिन जून में देश की कई राज्य सरकारों ने लॉकडाउन को अनलॉक किया और आवाजाही शुरू हो गयी|
ग्रहण देखने की थोड़ी उम्मीद तो बढ़ी लेकिन फैलती बीमारी से हिम्मत तो नहीं बढ़ रही थी| कोशिशें फिर भी जारी थीं| हालांकि अब हमारी ग्रहण देखने की जगह बदल गयी थी| आकाशमित्र के दो साथी मनोज जी और शिशिर लगातार मेरे संपर्क में थे| प्रयास था कि राजस्थान के किसी इलाके से इसे देखा जाये| मैं भी जगह ढूंढ रहा था| राजस्थान के सूरतगढ़ के मेरे दोस्त गौरव से बातचीत हुई क्यूंकि जिस इलाके से ग्रहण गुजरने वाला था उसमे सूरतगढ़ भी शामिल था| लेकिन पल पल बदलती परिस्थितियां किसी भी प्लान को टिकने नहीं दे रही थी| एक दिन कुछ स्थानीय सरकारी अधिकारियों से बातचीत कर रहे थे तो उन्होंने राजस्थान सरकार के राज्य की सीमा को बंद करने के आदेश दिखाए| उम्मीद पर एक बार पुनः पानी फिर गया| मनोज जी से बात हुयी उन्होंने कहा कि हम नहीं आ पाए तो तुम जरुर चले जाना|
एक दिन बाद स्थानीय सरकारी अधिकारी ने मेसेज भेजा कि सरकार ने राज्य सीमाएं फिर से खोल दी है और बाहर से आनेवाले किसी को अब नहीं रोका जायेगा| अब शिशिर और मनोज जी को मैंने कहा कि वे आ सकते हैं|
सूरतगढ़ राजस्थान का एकमात्र शहर था जो सभी तरह के लॉकडाउन में ग्रीन ज़ोन बना रहा था| लेकिन आगे की परिस्थितियां हम भी नहीं जानते थे| सूरतगढ़ के दोस्त के साथ मिलकर कुछ व्यवस्थाएं बनायीं| शुक्रवार की सुबह से दोपहर तक हमारा प्लान बिगड़ते बिगड़ते वापस पटरी पर आया| शिशिर और मनोज जी पुलिस और मेडिकल क्लीयरन्स लिया और चल पड़े| रात का सफर तय कर के उन्हें सुबह सिरोही पहुँचे|
फिर हम तीनों निकल पड़े सूरतगढ़ की ओर| दिन भर की गर्मी में की गयी यात्रा काफी थकान भरी रही| हमने उस रात होटल में रहने का फैसला किया| वैसे साथ में टेंट भी था लेकिन सूरतगढ़ की गर्मी के सामने हमारी टेंट में रहने की हिम्मत नहीं बनी| हालांकि मन में दुविधा भी थी लेकिन थकान और गर्मी के सामने दुविधा कमजोर पड गयी| मेरे मित्र का भाई सौरव हमसे मिलने आया था| हम भी सोच रहे थे कि कहाँ से ग्रहण को देखे| हम यह नहीं चाहते थे कि किसी के संपर्क में आये, तो कोई ऐसे जगह की पूछताछ हमने उससे की| उसने कहा कि भाईसा, ग्रहण के दिन कोई बाहर नहीं निकलेगा तो भीड़ की चिंता तो आप छोड़ दीजिये लेकिन यहाँ आसपास तो सिर्फ रेत के टिब्बे हैं| इस समय भरी गर्मी में रेत के टिब्बों पर से ग्रहण देखना मुश्किल है और आपको आसपास कोई छांव भी नहीं मिलेगी| बेहतर होगा कि आप होटल की छत से ही देख लो| यह उपाय भी ठीक था हमे पसंद भी आया क्योंकि आते वक्त की गर्मी हम झेल चुके थे|  तय हुआ कल का ग्रहण होटल की छत से देखा जाये|
सुबह तड़के ही हम उठ गए ऊपर छत पर गए तो देखा की आसमान में बादल ही बादल फैले हैं और शहर के आसमान  पर धुल की चादर भी थी| शायद रात को रेत की आंधी आई हो| मन में विचार आया कि इतनी दूर आ कर क्या ग्रहण देख पाएंगे? शिशिर ने झट से मौसम विभाग की साईट देखी तो सॅटॅलाइट इमेज में काफी दूर तक बादल दिख रहे थे| लेकिन हवा भी चल रही थी| घंटे भर में बादल हटना शुरू हुए| हमने भी तैयारी शरू कर दी| सुबह 10 बजे के करीब हम छत पर पहुँच गए| आसमान एकदम साफ़ हो गया था|
करीब 10 बज कर 15 मिनट पर चन्द्रमा ने सूर्य के पश्चिमी किनारे को छुआ| ऐसे लगा कि सूरज की सुनहरी थाली का एक टुकड़ा टूट हो गया हो| धीरे धीरे चन्द्रमा सूर्य को ढंकने लगा| सूरज की रोशनी में गिरावट लगातार दिख रही थी| इस दरमियान कुछ पत्रकारों को खबर लग गयी थी कि कुछ लोग सूर्यग्रहण देखने सूरतगढ़ आये हैं| वे हमसे आकर मिले| लेकिन अन्दर से हमे लग रहा था कि शायद हमे इनसे बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम बहुत दूर से ऐसे महामारी के समय आये हैं| हम नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह के संक्रमण की वजह या तो हम या तो वे लोग बने| पर ग्रहण जैसी घटना को उन लोगों तक पहुँचाना भी जरुरी लगा जो घरों में छिपे बैठे थे| ऐसे में उनसे भी उचित दूरी बनाकर बातचीत की| उन्होंने भी ग्रहण के चश्मों से ग्रहण देखा| अंधविश्वास पर भी उनसे बात हुयी| भरे ग्रहण में सब ने पानी भी पिया|
सूर्य के सामने आता हुआ चन्द्रमा

पत्रकारों से बात करने के दौरान कुछ सवाल आये थे जैसे क्या इस ग्रहण का कोरोना महामारी के साथ कोई सम्बन्ध है? 2020 साल बहोत बुरा रहा क्या इस ग्रहण की वजह से और भी मुश्किलें बढ़ेंगी क्या? ग्रहण की छाया अशुभ होती है क्या? वैसे तो इस तरह के सवाल ग्रहण के दौरान काफी पूछे जाते है| लेकिन जब इस पर बात होती है कि सूर्य और चन्द्रमा एक दुसरे के आमने सामने आते हैं तो ग्रहण होता है इसका शुभ अशुभ से कोई नाता नहीं है| कई सारे लोग इस बात में हाँ भी मिलाते हैं| यह भी मानते हैं कि सूर्य के सामने चन्द्रमा आता है उसकी छाया पृथ्वी पर पड़ती है कोई शुभ अशुभ नहीं होता| लेकिन ग्रहण के वक्त यही लोग घरों में छुपकर बैठते हैं और सभी तरह के धार्मिक कर्मकांड करते हैं|
अब तो 2020 साल को भी बुरे साल कि उपाधि मिल गयी है| कुछ लोगों के अनुसार सभी तरह की बुरी घटनाये ये साल लाया और उसपर यह ग्रहण भी| इस तरह की मान्यताएं पहले भी समाज रह चुकी है| ग्रहण दिखने या धूमकेतु दिखने पर किसी राजा की मौत के होने या महामारियों का फैलने से जोड़ दिया जाता है| ग्रहण को ईश्वर का प्रकोप या चेतावनी मानने वालों की संख्या कभी कम नहीं रही है| लेकिन विज्ञान की खोज़ से यह साफ हो चुका है कि मानव या मानवीय समाज में घटने वाली घटनाओं के पीछे किसी भी खगोलीय पिंडो या घटनाओं की भूमिका नहीं होती| महामारियां सूक्ष्मजीवों से फैलती है न की ग्रहण की वजह से और ना ही महामारियों को ग्रहण की वजह से फैलने में बल मिलता है| यह तो प्राकृतिक घटनाएँ है|  
रिंग ऑफ़ फायर के कुछ हिस्से चन्द्रमा के पहाड़ों की वजह से टूटे हुए दिख रहे है|

अग्निवलय के बाद की स्तिथि

जैसे जैसे ग्रहण की घडी समीप आने लगी वैसे हम और भी सतर्क हो गए| सूर्य के सामने अब धीरे-धीरे चन्द्रमा आने लगा| चन्द्रमा का आकार सूर्य के आकार से थोड़ा सा ही कम था| रोशनी में तेजी से गिरावट आ गयी| रोशनी एकदम तो बंद नहीं हुयी लेकिन लगभग शाम जैसा माहौल हो गया| 11 बजकर 52 पर सूर्य के सामने चन्द्रमा पूरी तरह आ गया| लेकिन चन्द्रमा जरा सा छोटा होने की वजह से सूर्य का जरा सा बाहरी हिस्सा खुला रह गया और एक अग्नि-वलय बन गया| इस वलय की मोटाई पिछले वलयाकार सूर्य ग्रहणों से काफी छोटी थी| चन्द्रमा के दक्षिणी हिस्से के ऊँचे पर्वतों की वजह से इस वलय का कुछ हिस्सा टुटा हुआ सा लग रहा था| हमारे पास बस यही अल्फाज़ थे बेहद शानदार और खुबसूरत| यही वह नज़ारा जिसने हमारी यात्रा को सफल बनाया| कुछ की सेकंड्स में चन्द्रमा सूर्य के सामने से थोड़ा सा हट गया और अग्नि-वलय दिखना बंद हो गया| धीरे-धीरे चन्द्रमा सूर्य के सामने से गुजरता हुआ पूर्व की ओर बढ़ रहा था| अब फिर से सूर्य की रोशनी बढ़ रही थी और तापमान भी| 1 बज कर 50 मिनट पर चन्द्रमा सूर्य के सामने से पूरी तरह से हट गया था| इतनी दूर आकर ग्रहण के समय चन्द्रमा के पहाड़ और अग्नि-वलय देखना काफी मजेदार अनुभव था|
सूरतगढ़ की वीरान पड़ी सड़के
 
तुरंत हम लोगों ने खाना खाकर सूरतगढ़ से विदाई ली| आज के दिन सूरतगढ़ का माहौल काफी अलग था| कल के दिन जब सूरतगढ़ आये थे तब वहा काफी चहल-पहल थी, मार्किट खुले थे, काफी लोग आम दिनों जैसे ही घूम रहे थे| लेकिन आज तो मार्किट की एक भी दुकान खुली नहीं थी| सड़के भी वीरान पड़ी थी| ग्रहण के दिन में आज भी भारत में यह आम बात है| यह भी बड़ी विडम्बना है कि आज कोरोना महामारी के समय हर एक व्यक्ति इस बीमारी से इजात पाने के लिए विज्ञान की तरफ आस लगाकर बैठा है और एक तरफ वो ग्रहणों को अशुभ मानकर घर में ईश्वर की पूजा में भी बैठा है| पढ़े लिखे समाज में आज इस दुविधा को काफी आसानी से देखा जा सकता है|
खैर महामारी के ऐसे समय में देखा गया यह ग्रहण हमारे लिए हमेशा यादगार रहेगा|

Sunday, December 8, 2019

26 दिसम्बर 2019 को दिखेगा वलयाकार सूर्यग्रहण

26 दिसम्बर 2019 को वर्ष का आखरी सूर्यग्रहण दिखेगा| यह वलयाकार सूर्यग्रहण होगा| इस तरह के सूर्यग्रहण विरले ही होते है| मैंने ऐसा ही ग्रहण 15 जनवरी 2010 में धनुषकोडी से देखा था, जो तमिलनाडू के रामेश्वरम के पास मछुवारों का एक कस्बा है| वह अनुभव काफी रोमांचकारी था| ग्रहण वैसे भी काफी मजेदार अनुभव देने वाले होते है| आकाश में चन्द्रमा और सूर्य लगभग एक ही आकार के नजर आते है| वास्तव में चन्द्रमा सूर्य से चारसौ गुना छोटा है| लेकिन सूर्य बड़ा होने के बावजूद इसकी पृथ्वी से दुरी, चन्द्रमा और पृथ्वी के दुरी की तुलना में चारसौ गुना ज्यादा है| सूर्य-चन्द्रमा का यही कमाल का आकार और दुरी का अनुपात इन्हे पृथ्वी के आकाश में लगभग एक जैसे आकार का दिखता है| इसी वजह से पुरे सौर मंडल में पृथ्वी ही ऐसी एक जगह है जहाँ से सूर्यग्रहण के कमाल के नज़ारे देख सकते है|

15 जनवरी 2010 का वलयाकार सूर्यग्रहण, धनुषकोडी 
जब सूर्य के सामने से चन्द्रमा गुजरता है तब वह सूर्य को ढक देता है और सूर्य कुछ देर के लिए चन्द्रमा के पीछे छुप जाता है| सूर्य कितना ढक जायेगा यह चन्द्रमा की पृथ्वी दुरी तथा आकाश में उसके मार्ग पर निर्भर करता है| इन्ही वजह से हमे सूर्यग्रहण तीन प्रकार के दिखाई देते है|

आंशिक सुर्यग्रहण: आंशिक ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य के सामने पूरी तरह से नहीं गुजरता और कुछ ही हिस्से को ढक पाता है| इस प्रकार में अगर चन्द्रमा सूर्य को 99% प्रतिशत भी ढक ले फिर भी आंशिक ही गिना जाता है|

पूर्ण सूर्यग्रहण: इस प्रकार में सूर्य पूरी तरह चन्द्रमा के पीछे छुप जाता है| इस ग्रहण में चन्द्रमा का सापेक्ष आकार सूर्य के बराबर या सूर्य से बड़ा होता है|

वलयाकार सूर्यग्रहण: इस ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य के सामने से गुजरता तो है पर चन्द्रमा का आकार छोटा होता है इस वजह से सूर्य की डिस्क का बाहरी हिस्सा खुला ही रह जाता है और यह हमें वलय के आकार का दिखाई देता है| वलयाकार ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी के परिक्रमा कक्ष में ज्यादा दुरी पर होता है इसे अपॉगी apogee पॉइंट कहा जाता है| पृथ्वी से ज्यादा दूर होने के कारण ही चन्द्रमा का आकार आकाश में थोडा छोटा नजर आता है|

सूर्यग्रहण के प्रकार आंशिक, पूर्ण और वलयाकार 

कोई भी सूर्यग्रहण पृथ्वी पर सब जगह से नही दिखाई देता| इसकी वजह यह है की चन्द्रमा की मुख्य परछाई या छाया का आकार बहोत छोटा होता है| इसकी चौडाई कुछ सौ किलोमीटर के आसपास ही होती है| पृथ्वी के जिस हिस्से से गुजरती है उसी जगह से उन्नत ग्रहण या Maximum Eclipse दिखाई देता है| चन्द्रमा की उपछाया वाला हिस्सा जिन जगहों पर से गुजरता है वहा से ग्रहण का कम हिस्सा दिखाई देता है| मुख्य छाया से आपकी दुरी जीतनी ज्यादा होती है उतना ही कम ग्रहण आप देख सकते है| जब भी ग्रहण हो तो मुख्य छाया के केंद्र के करीब रहना ज्यादा बेहतर होता है|



26 दिसम्बर वाले ग्रहण की छाया दक्षिण भारत से गुजरेगी| इस छाया के मार्ग में आनेवाले मुख्य शहर कन्नूर, कोइम्बतुर और डिंडीक्कल है| इस छाया की चौडाई लगभग 150 किलोमीटर है और यह छाया सऊदी अरब से होकर भारत, श्रीलंका, सिंगापुर और फिर प्रशांत महासागर में ग्वाम द्वीप तक चलेगी| ऊपर दिखाए गए एनीमेशन में आप इस छाया का मार्ग देख सकते है| भारत में यह सुबह 8 बजकर 5 मिनट से शुरू होगा| वलयाकार स्थिति में 9 बजकर 24 मिनट  से 9 बजकर 27 मिनट तक रहेगा| फिर 11 बजकर 5 मिनट पर पूरा हो जायेगा| भारत के बाकी हिस्सों से यह आंशिक रूप में दिखेगा|

ग्रहण की मुख्य छाया का हिस्सा गहरे रंग से दिखया गया है, उन जगहों पर वलयाकार ग्रहण दिखेगा| बाकि जगहों पर आंशिक ग्रहण दिखाई देगा| सौजन्य - विकिपीडिया
सूर्य ग्रहण देखने के लिए आपको विशेष सावधानी लेनी होती है| सूरज की किरणे हमारी आँखों को नुकसान पहुंचा सकती है| इसीलिए सूर्य ग्रहण के लिए बने फ़िल्टर चश्मों से ही सूर्य ग्रहण देखना चाहिए|

ग्रहण को लेकर और भी जानकारी मैंने मेरे इसी ब्लॉग में लिखी है| उसे आप इस लिंकपर जाकर पढ़ सकते है|  http://amolkate.blogspot.com/2018/06/

Reference
1. विकिपीडिया - https://en.wikipedia.org/wiki/Solar_eclipse_of_December_26,_2019
2. अनिमेशन - https://www.timeanddate.com/eclipse/solar/2019-december-26
3. space.com
4. NASA Eclipse website

Saturday, July 28, 2018

Pictures from the Lunar Eclipse of the century

There were much talk about this Lunar eclipse because it was very special for this century. It was the longest total lunar eclipse of the century. Eclipses happens in June, July, August and September are usually depends upon the mercy of monsoon clouds. I remember many eclipses which washes in the Monsoon clouds. I have never witnessed Total Solar Eclipse. Shadow of the moon on earth surface is very small so it could visible from small geographical belt. On 22 July I was in that shadow belt, but monsoon clouds covered this show on that day. 

This time also I was feeling that, there are chances of happening this events under clouds only. From entire day sky was covering with thick clouds of monsoon. But, astronomy is full of surprises you never expect what will happen. This time when partial eclipse was going to start means around 11:45 pm I just peek out side and saw clouds were started getting clear and full moon appeared with bright red planet shining near to it. It was sudden. Then I immediately, take out my simple camera, DSLR camera. Binocular, camera stand, mobile and telescope. I just wanted to get ready with whatever came in my hand 😄. 

I got few good pictures from camera and did some telescopic observations. on the same day Mars was also in opposition to earth. Mars shining big brightly near to eclipsing moon. I took time to observe this red planet. It was very windy so mars detail was not visible clearly through telescope but if sky condition get settle in coming days then mars will be the great object to observe for next days. 

When moon moved into umbra of earth it turned into red. This time red color was bit darker from last 31 January eclipse. But it was great to see both Mars and Red Moon together. how many time we will get such opportunity. I struggle with my camera setting to capture this red pair. For an hour was awake. Then, clouds started gathering after giving good two and half hour of clear sky. I could see half of the eclipse part but it was great to observe and capture it. Here, are some clicks from the eclipse. 








The red pair of Planet Mars and eclipsed Moon

Saturday, March 31, 2018

Blue Moon and how we see it

On 31 March we are witnessing Blue Moon. You might have encounter with term Blue Moon in news media. In media, news usually appear with Blue color moon picture and says 'this month we are going to see blue moon'. Many people wonders  how moon will be in blue color? it must be a great sight in sky seeing blue color moon. But, Blue moon is nothing to do with color. It is a name of moon which occurs as a extra full moon in a month or in a astronomical season.
Blue moon is not actualy blue in color

In every cultures moon has different names. In India too have different names according to seasons and festivals. In western culture, they also given name to full moon according to seasons. Like, October month moon is called as Hunters Moon because peoples who lives at northern hemisphere start collecting food and meat for coming winter. December moon is called as cold moon and March moon is called as worm moon. These names are not uniformly used in entire western culture. These also change from tribe to tribe or culture to culture. 

Every culture or tribe made their own calender based on sun or moon to maintain their yearly activities. Every season like spring, summer, fall and winter usually see three full moons. These seasons happens due to sun motion in Earth's sky. Sun takes 365.24 days to complete one cycle in Earth's sky which we called a year. (Earth move around the sun in space and from earth we see sun is moving in sky. Its a relative motion we observe.). But, to complete one cycle in sky moon takes 29.5 days. When sun colpletes its one cycle in 365.24 days, by the time moon complets 12.37 cycles. So, each calender year get around 11 extra days from moon cycle. Due to accumulation of these days from lunar cycle we see extra full moon in a season after two or two and half calendar year. This extra full moon is called as Blue moon. Indian calender make adjustment in calendar to stay with seasons by inserting Adhik Maas after two and half year. (Incorporating extra moon cycle vary with different calendars.)

Another way to describe Blue moon is, a second full moon in same calendar month. This calendar year 2018 has two Blue moon month one was January and second is March. This is rare, next calendar year with two Blue moon will be 2037. But, sinlge Blue moon month happenes every two and half year. Next, Blue moon will appear in Octber 2020. 

Astronomical events and news media

When people hear or read about blue moon, they usually think that moon will appear in blue color. Because, the way news media present this event. In age of Information and technology news media has become most unscientific mode of information. Many times not enough research happens aroud topic and to just grab attention of public, news are presented in dramatic way which leads to misconception. News Media also wrongly present other natural or astronomical events like eclipses, appearance of comets or when mars comes near to earth in its orbit. For example, news about eclipse will show less about science behind it and more about effect of eclipse on someones zodiac signs and how it will doom person's fate. This leads people and society towards superstions. I think every time nature gives us opportunity to become more rational and logical, we misuse it and becomes more irrational. News media has played very important role for social awareness time to time. Now, in this time it is very much required a role of scientific and rational media to create scientific attitude in society. 







Friday, March 16, 2018

Total Lunar Eclipse of 31 January 2018

Hi, everyone this is long time I have written anything on my blog. I have been doing my astronomy activities but did not shared them on this blog. Today i am going to share our some experiences and photographs of total Lunar eclipse of 31st January 2018. The special thing about this lunar eclipse was it was on Blue moon means it was second full moon in the same month. This Lunar eclipse was visible from the all of Asia. From India we could not see the first half of the eclipse. When moon rose in our horizon it was almost began the totality of eclipse.

Many people do not find Lunar eclipse exciting as solar eclipse. There might be many reasons like time duration. Lunar eclipse runs for longer than solar eclipse. Solar eclipse produce far more marvelous views than Lunar eclipse. But, I think lunar eclipse is impressive by its own way. It also produce fantastic views, mine favorite is traveling of Earths shadow over lunar landscape. if we observe it through telescope it definitely make you excited. In total lunar eclipse moon never disappeared like sun does in solar eclipse. In fact moon become red in color when it goes to total phase.
        Moon was in total phase when rose in sky
When earth comes in between sun and moon, suns light do not get cut entirely. But due to to earth's atmosphere which stands almost 60 kilometer high turns some of the sun light towards moon. This redness is different in different eclipses. It also depend on the dust particle activities in atmosphere. If dust particle get more in atmosphere then moon color turns more deep red.
 
Earth's shadow shape can be seen here
                                          Last touch of earth's shadow:The eclipse getting over

We arranged event for observing this lunar eclipse with some government teachers and some community members also came. it was nice to have interaction with them. teachers showed full interest in this event. First time they were looking eclipse through telescope. However, we noticed that some of the community members hesitate to watch lunar eclipse. They might have thought that this can bring bad omen to them. We had discussion with them that there is no such thing like bad omen. But for grown ups its very hard to leave their notions.
Before, this eclipse we went to some schools in rural areas and discuss about eclipse with students over there. Students were more curious to know about such things. In my own experience I believe that young students can help us to work towards such myths rooted in society. They are open towards learning. they asks questions to at least their parents and relatives and make them to watch such events which people thinks bad.
Anyway, such events like eclipse gives us opportunity to go in common people and talks about the scientific thinking and rational against traditional thinking of religions and myths. It also help us to make dialogue on such issues and make people aware against false beliefs.